मुक्तिबोध के काव्य में नारी के प्रति संवेदना
डाॅ. (श्रीमती) मधुलता बारा
व्याख्याता हिंदी साहित्य एवं भाषा-अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल वि.वि., रायपुर
प्रस्तावनारू
मुक्तिबोध मानवीय संवेदना के धनी थे। उन्होंने समाज के सभी तबकों के व्यक्तियों की भावनाओं, आशाओं, अभिलाषाओं, गतिविधियों को गहराई से देखा और परखा है। वे आम-से-आम आदमी के आंतरिक एवं बाह्य भावों को, मर्म को, पीड़ा को, घुटन को, कुण्ठा को बारीकी से समझने, महसूस करने वाले कवि थे। दरअसल आम आदमी अर्थात् श्रमिक, मज़दूर, किसान, निम्नवर्ग की आम जनता एवं नारियों के प्रति निष्ठापूर्वक समर्पित थे। इस बात की साक्षी उनकी अनेक कविताएँ है। वे निम्नवर्गीय समाज के आम आदमियों के दुःख-दर्द, पीड़ओं को नज़दीक से देखा है, जिया है, भोगा है। खास तौर पर नारी की दयनीय दशा का जो चित्रण किया है, उससे महसूस होता है कि वे नारियों के पक्षधर थे। चन्द्रकांत देवताले के शब्दों में- ‘‘युग की विभीषिकाओं का चित्रण करते हुए उन्होंने युग की पस्ती और निराशा के अतिरिक्त जन-संघर्ष को भी अपने काव्य में रूपायित करने की चेष्टा की। मुक्तिबोध का काव्य युग के जटिल संघर्ष को सरलीकृत नहीं करता, लेकिन संघर्ष के पीछे मौजूद उम्मीद की भावना उनकी आँखें से कभी ओझल नहीं होती।’’1 आगे शंकर वसंत मुद्गल मुक्तिबोध की कविताओं की नारियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहते हैं- ‘‘मुक्तिबोध के काव्य में शोषित मानवों और उनके जीवन के प्रति सहानुभूति, शिशुओं के प्रति वात्सल्य-दृष्टि, पूँजीपतियों की हवश का शिकार बनी नारी के प्रति स्नेहिल एवं सजल दृष्टि मिलती है। उन्होंने शोषक-वृत्ति और उसका शिकार बने समाज का शब्दांकन भर नहीं किया है, अपितु उन्हें अपने आर्द्र संवेदना भी अर्पित की है।’’2 नारी की शोषित अवस्था का चित्रण उनके अनेक कविताओं में देखा जा सकता है। कहीं वह वासना का शिकार बन बलत्कार का दंश एवं अपमान सह रही है, कहीं आर्थिक अभाव के कारण गर्भावस्था में भी श्रम करते हुए दिखाई देती है। कवि ने कविता में विद्रोह के बावजूद खूबसूरत कमरों में, अपने आँखें में सामने, भोली-भाली, मासूम चेहरे वाली, हिरण-सी आँखों वाली नारी का शोषण दैत्यों द्वारा किया जाता है। नारी-शोषण, बलत्कार की वीभत्सता का सजीव चित्रण ‘एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन’ कविता में किया गया है-
‘‘खूबसूरत कमरों में कई बार
हमारी आँखों के सामने
हमारे विद्रोह के बावजूद,
बलात्कार किये गये
नक्षीदार कक्षों में
भोले निव्र्याज नयन हिरणी-से
मासूम चेहरे
निर्दोष तन-बदन
दैत्यों की बाँहों के शिकंजों में इतने अधिक
इतने अधिक जकड़े गये
कि जकड़े ही जाने के
सिकुड़ते हुए घेरे में वे तन-मन
दबते-पिघलते हुए एक भाफ बन गए।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 82)
‘डूबता चाँद कब डूबेगा’ कविता में कवि ने परिवार की गरीबी की मार झेल रही माँ के जीवन की जीवंत कथा जो ठिठुरन एवं पुराने कटे-फटे जर्जर साड़ी के रंग के साथ जीती है, कवि के मन को उद्वेलित करती है। गरीबी, अभवग्रस्त जीवन का चित्रण कवि ने मार्मिकता के साथ किया है। चन्द्रकांत देवताले के शब्दों में- ‘‘आत्मगत यथार्थ के भीतर झाँकते हुए मुक्तिबोध बौद्धिकता की सर्चलाइट अपने भीतर फेंकते हैं। इस रोशनी में उन्हें अपना निजी अंतद्र्वंद्व भी साफ-साफ दिखाई पड़ता है। व्यक्तिगत स्तर पर अनुभूत बेचैनी के अनेक दृश्य मुक्तिबोध की कविता में है, यद्यपि यह भी सही है कि व्यग्रता को अतिक्रांत करके गहरे मानव-प्रेम में बदलने की कोशिश भी उनके यहाँ कम नहीं है। यही कारण है कि परिवार की अत्यंत कोमलतम स्मृतियाँ भी उन्हें विक्षोभ की सड़कों पर ठेल देती है। ‘माँ की जर्जर बदरंग साड़ी का रंग’ जैसी कविता में कोमल स्मृति अंततः विक्षुब्ध यथार्थ से टकराने का साहस बनती है। इसके अतिरिक्त उनकी कविताओं में व्यक्ति स्तर पर अनुभूत त्रासद यथार्थ के कारण कई स्थलों पर सच्ची पस्ती और निराशा के चित्र भी देखने को मिलते हैं।’’3 ‘डूबता चाँद कब डूबेगा’ कविता की जीवंत चित्रण इस प्रकार है-
‘‘माँ की जीवन-भर की ठिठुरन,
मेरे भीतर
गहरी आँखों वाला सचेत
बन गयी दर्द।
उसकी जर्जर बदरंग साड़ी का रंग
मेरे जीवन मे ंपूरा फैल गया।
मुझको, तुमको
उसकी आस्था का विक्षोभी
गहरी धक्का
विक्षुब्ध ज़िन्दगी की सड़कों पर ठेला गया।
भोली पुकारती आँखें वे
मुझको निहारती बैठी हैं।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 75)
कवि ने कविता में आधुनिक सभ्यता के विघटन, विद्रुपता को पागल स्त्री के समान मैली, दरिद्र एवं अभावग्रस्त बताया है, जो अपने स्तन से बालक को झाई की तरह चिपकाई रहती है। विश्रृंखल एवं उच्छृंखल समाज द्वारा अपनी वासना पूर्ति के लिए उसका प्रयोग किया जाता है। ‘ओ काव्यात्मन् फणिधर’ कविता में कवि ने पागल स्त्री की मार्मिकता का चित्रण इस प्रकार किया है-
‘‘वह पागल युवती सोयी है
मैली दरिद्र स्त्री अस्त-व्यस्त-
उसके बिखरे हैं बाल व स्तन है लटका-सा,
अनगिनत वासना-ग्रस्तों का मन अटका था !
उनमें जो उच्छृंखल था, विश्रृंखल भी था,
उसने काले पल में इस स्त्री को गर्भ दिया !
शोषिता व व्यभिचारिता आत्मा को पुत्र हुआ
स्तन मुँह में डाल, मरा बालक ! उसकी झाईं,
अब तक लेटी है पास उसी की परछाई !!’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 144)
मुक्तिबोध ने नारी-पात्रों की शोषण की पीड़ाओं को मार्मिकता के साथ उभारा है। एक पागल स्त्री के पुत्र प्रेम की व्यथा सहानुभूति एवं संवेदनात्मक रूप से कविता में चित्रित किया है। मरे हुए पुत्र की झाई, पुत्र के प्रति रागात्मक, पुत्र की रक्षा के लिए परछाई बनकर उसे अपने सीने से चिपकाए रखना, दूर जंगल से आने वाली भयानक सियार की आवाज़ उसकी आंतरिक पीड़ा को और अधिक व्यथित करती है। ‘ओ काव्यात्मन् फणिधर’ कविता में नारी व्यथा का चित्रण इस प्रकार है-
‘‘पागल स्त्री के
स्तन से चिपकी
बालक झाई
जंगल में दूर सियार रो रहे हैं !!’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 143)
कवि ने कोमल-काया वाली स्त्री जो गर्भवती है। अपनी आर्थिक अभाव के कारण शारीरिक श्रम, मज़दूरी करके अपनी जीविका के साधन जुटाना उनकी विवश्ता है। गर्भावस्था में भी वजनदार घड़ों से पानी भरना, कपड़ोें को भाड़-भाड़ धोना, घर के अंदर का काम, बाहर का काम करने के बाद थक-हार कर मज़दूरी के लिए जाना उसकी नियति बन गई है। उसे अपने घर-गृहस्थी के साथ-साथ अपने बच्चों के भविष्य के लिए आस लिए कार्य करना उसकी मज़बूरी है। गर्भस्थ कृशकाया वाली नारी का मार्मिक चित्रण ‘मुझे याद आते हैं’ कविता में कवि ने इस प्रकार की है-
‘‘मुझे याद आती है
आँखों में तैरता है चित्र एक
उर में सम्भाले दर्द
गर्भवती नारी का
कि जो पानी भरती है वज़नदार घड़ों से,
कपड़ों को धोती है भाड़-भाड़,
घर के काम बाहर के काम सब करती है,
अपनी सारी थकान के बावजूद।
मज़दूरी करती है
घर की गिरस्ती के लिए ही
पुत्रों के भविष्य के लिए सब।
उसके पीले अवसाद-भरे कृश मुख पर
जाने किस (धोखे भरी ?) आशा की दृढ़ता है।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 97)
कवि ने श्रमशील गर्भावती नारी की आत्मा की व्यथा का चित्रण करते हुए कहते हैं कि यदि नारी सारा दिन मज़दूरी करके, जीवन के अनेक अभावों को झेलते एवं सहते हुए, कष्टों को लात मारकर, निराशाओं एवं कुण्ठाओं को ठुकराकर उनका एक ही लक्ष्य होता है मज़दूरी करना। उनकी श्रमशीलता को देखकर कवि के मन को आस्था एवं बल मिलता है। ऋतुपर्ण का कथन है- ‘‘उनकी काव्य-निष्ठा का स्रोत सामान्य जन की कर्मठता और श्रमशीलता में है। वे सर्वहारा वर्ग में अपने सर्जन की शक्ति ग्रहण करते हैं और उन्हीं की आत्मा का दर्द संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। एक गर्भवती नारी को निरंतर श्रमरत देखकर मुक्तिबोध भी उसी तरह जीवित रहने के लिए सोचने लगते हैं।’’4 ‘मुझे याद आते हैं’ कविता में श्रमशील नारी का चित्रण इस प्रकार दृष्टव्य है-
‘‘यदि उस श्रमशील नारी की आत्मा
सब अभावों को सह कर
कष्टों को लात मार, निराशाएँ ठुकराकर
किसी ध्रुव-लक्ष्य पर
खिंचती-सी जाती है
जीवित रह सकता हूँ मैं भी वैसे ही !’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 98)
मुक्तिबोध ने मेहनतकश एवं श्रमशीलता, सजग एवं सहनशील जीवन जी रहे जन-जीवन का चित्रण करते हुए उन्होंने लिखा है- ‘‘मैं तो सिर्फ मेहनत पर अकारथ मेहनत पर, उस मेहनत पर जो अपना पेट भी नहीं भर सकती, उस मेहनत पर जो बहुत सजग हैं, उस सहनशील श्रम पर लिखने वाला हूँ। मैं उस श्रम का चित्रण करना चाहता हूँ, जिसका बदला कभी नहीं मिलता और जिसे आए दिन आत्म-बलिदान और त्याग की नसीहत दी जाती है।’’5
कविता में कवि जन-साधारण के प्रति अपना विश्वास एवं संवेदना प्रकट करते हैं। जन-सामान्य लोग उनके ह्नदय, मन में बसे एवं जुड़े हुए हैं। उनकी हर शब्द-संपदा एवं भाव-संपदा उन्हीं के जीवन से बँधा हुआ है। यहाँ बोझ उठाए माँ, बहनें, बेटियोें एवं बहुओं की कर्मठता का चित्रण निष्ठा एवं श्रद्धा भावना के साथ किया गया है। कवि का मन उन्हें सलाम एवं राम-राम प्रकट करने के लिए व्याकुल है। मुझे याद आते हैं’ कविता का उदाहरण दृष्टव्य है-
‘‘बोझा उठाये हुए
माएँ, बहनें, बेटियाँ.............
सबको ही सलाम करने की इच्छा होती है,
सबको राम-राम करने की चाहता है जी
आँसुओं से तर होकर प्यार के..........
(सबका प्यारा पुत्र बन)
सभी ही का गीला-गीला मीठा-मीठा आशीर्वाद
पाने के लिए होती अकुलाहट।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 99)
कविता में कवि ने शोषक वर्ग द्वारा शोषित माँ, बहनों की पीड़ाओं, उनकी उदासी, मुरझाए चेहरे, उनके सीधेपन का चित्रण आत्मीयता के साथ किया है। माँ-बहनेें चाहकर भी उनका विद्रोह नहीं कर पाती और चुपचाप शोषित एवं पीड़ित जीवन जीती हैं। नारियों की इस मनःस्थिति को देखकर कवि का मन अत्यंत दुःखी एवं पीड़ित होता है। वे उनके प्रति दया, करूणा एवं सहानुभूति प्रकट करते हैं। ‘मेरे लोग’ कविता में इसी कथा-व्यथा का चित्रण किया गया है-
‘‘गिरस्तिन मौन माँ-बहनें
सड़क पर देखती हैं
भाव-मंथर, काल-पीड़ित ठठरियों की श्याम गो-यात्रा
उदासी से रंगे गंभीर मुरझाये हुए प्यारे
गऊ-चेहरे
निरखकर,
पिघल उठता मन !!’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 107)
पूँजीपति, सामंती, पोश पुरुष, शिक्षित, सुसंस्कृत एवं बुद्धिजीवी वर्ग की अपेक्षा शोषित, पीड़ित, दमित, श्रमशील सर्वहारा वर्ग की पीड़ा को स्त्री मन-ही-मन सहज एवं सरलता से पहचान लेती है। शोषक वर्ग द्वारा शोषित किए जाने पर अपने बच्चों की रक्षा के लिए उसे सीने से चिपका लेती है। कभी-कभी उनका भोलापन एवं करूणा क्रांतिकारी भी होता है। नारी चाहे किसी भी वर्ग से क्यों न आई हो, उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक परंपरागत रूप से कई नियमों से बँधे होने के कारण उन्हें शोषण का शिकार होना पड़ता है। ‘मेरे लोग’ कविता का उदाहरण दृष्टव्य है-
‘‘नहीं आये समझ में सत्य जो शिक्षित
सुसंस्कृत बुद्धिमानों दृष्टिमानों के
उन्हें वे हैं कि मन-ही-मन
सहज पहचान लेतीं !!
मग्न होकर ध्यान करती है कि
अपने बालकों को छातियों से और चिपकातीं।
भोले भाव की करूणा बहुत ही क्रांतिकारी सिद्ध होती है।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 107-108)
संसार की परंपरा में ‘माँ’ का व्यक्तित्व एक प्रतीकात्म स्वरूप है, जो सभ्यता रूपी जंगल में बिखरी पड़ी सूखे डण्ठल, सूखी टहनियाँ, रूखी डालें आदि को एकत्रित करती हैं, कहीं-न-कहीं अग्नि और कष्ट, शोषक एवं सर्वहारा का प्रतीक है। सुरेश ऋतुपर्ण कहते हैं- ‘‘‘एक अंतर्कथा’ शीर्षक कविता में ‘माँ’ के माध्यम से व्यक्त किया गया है कि आज के सुविधाभोगी समाज में जीवन की तथाकथित सफलता प्राप्त करने की होड़ में अब तक के संचित ज्ञानकोश को तुच्छ समझ कचरे के ढेर में फेंक दिया है, जिसे ‘माँ’ बटोरती फिर रही है, क्योंकि वह जानती है कि तिरस्कृत परंपरा की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ आज के जीवन को सार्थक बना सकती है।’’6 कवि ने ‘एक अंतर्कथा’ कविता का चित्रण इस प्रकार किया है-
‘‘अग्नि के काष्ठ
खोजती माँ
बीनती नित्य सूखे डण्ठल
सूखी टहनी, रूखी डालें
घूमती सभ्यता के जंगल
वह मेरी माँ
खोजती अग्नि के अधिष्ठान।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 128)
परंपरा को लेकर माँ आगे-आगे चलती है, उसके पीछे मैं अर्थात् दूसरी पीढ़ी (सुविधाभोगी)। वस्त्र भले ही जीर्ण-शीर्ण हैं, लेकिन उनकी अस्थि दृढ़, शरीर की दृढ़ता, गतिशीलता, शक्तिमता और मज़बूती उसके जीवन से लगे हुए हैं। चाहे बरसात हो, ठंड हो, गर्मी हो, वह सदैव परंपरा को जीवित रखने को प्रयासरत है। सुरेश ऋतुपर्ण के शब्दों में- ‘‘कविता का काव्य नायक ‘मैं’ इस ‘माँ’ का पुत्र है, जो टोकरी उठाए पीछे-पीछे चल रही है। यह टोकरी उसके दायित्व-बोध की प्रतीक है। सूखी टहनियाँ आदि परंपरागत उपलब्धियों की प्रतीक है, जिन्हे काव्य-नायक दायित्व-बोध के वशीभूत टोकरी में लिए हुए है तथा कथित आधुनिकता व सुविधावादिता से प्रभावित होने के कारण उसे टोकरी उठाकर चलने में हिचकिचाहट भी महसूस होती है।’’7 ‘एक अंर्तकथा’ कविता का उदाहरण-
‘‘आगे-आगे माँ
पीछे मैं;
उसकी दृढ़ पीठ जरा-सी झुक
चुन लेती डण्ठल, पल-भर रूक
वह जीर्ण नील वस्त्र
है अस्थि-दृढ़
गतिमती व्यक्तिमत्ता
कर रहा अध्ययन मैं उसकी मज़बूती का
उसके जीवन से लगे हुए
वर्षा गरमी सर्दी और सुधा-तृषा के वर्षों से।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 130)
मुक्तिबोध ने अपनी कविता में नारियों के द्वारा घर की शोभा का चित्रण किया है, परंतु जिस समाज में, दुनिया में जीवन-यापन कर रहे हैं, वहाँ अनेक प्रकार के संघर्ष हैं। आज समाज में पुरुष वर्ग द्वारा, सामंत वर्ग, उच्च वर्ग द्वारा नारी के प्रति दुव्र्यवहार, अपमान, शोषण आदि से वो छली जाती है। अपनी जीविका के लिए वह संघर्ष करती है, परंतु वहाँ भी उसे अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ता है। ‘जब प्रश्न-चिह्न बौखला उठे’ कविता का उदाहरण-
‘‘जिससे गूँजा यों घर-आँगन
खनके मानों बहुओं की चूड़ी के कंगन।
मैं जिस दुनिया में आज बसा,
जन संघर्षों की राहों पर
ज्वालाओं से
माँओं का, बहनों का सुहाग सिन्दूर हँसा बरसा-बरसा।
इन भारतीय, गृहिणी-निर्झरिणी-नदियों के
घर-घर में भूखे प्राण हँसे।’’
(चाँद का मुँह टेढ़ा है: मुक्तिबोध: 174)
मुक्तिबोध मानवीय-संवेदना के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने मानवीय सुख-दुःख, निराशा, घुटन, संत्रास, टूटन, उत्पीड़न, प्रताड़ना, शोषण आदि का अपने काव्य में अभिव्यक्ति ही नहीं दी वरन आगे बढ़कर संघर्ष के साथ मानवीय मुक्ति का रास्ता भी तलाशते दिखाई पड़ते हैं। यह मुक्तिबोध की काव्य में मानवीय संवेदना की एक महत्वपूर्ण कड़ी एवं पहलू है। उनकी सहानुभूति हमेशा निम्न से निम्नवर्ग के आम आदमी को अपनी बाहों में समेटते रहे हैं तथा स्वयं उनकी बाहों में सिमटकर सहानुभूति एवं संवेदना प्रकट करते हैं। काव्य में मुक्तिबोध फैंटेसी के प्रसार में आंतरिक एवं बाह्य-संघर्ष को ही नहीं उन्होंने संसार की जो छवि प्रस्तुत की है, वह अद्वितीय और आश्चर्यजनक है। सिर्फ स्त्री के ही अनेक रूप यातना-यंत्रणा की दारूण स्थ्तिि हम उनकी ही कविता में देख सकते हैं। आधुनिक हिंदी कविता में यह अन्यत्र दुर्लभ है।
संदर्भ-ग्रंथरू
1. चंद्रकांत देवताले: मुक्तिबोध कविता और जीवन-विवेक; 275.
2. शंकर वसंत मुद्गल: मुक्तिबोध का काव्य सौष्ठव; 44.
3. चंद्रकांत देवताले: मुक्तिबोध कविता और जीवन-विवेक; 274.
4. सुरेश ऋतुपर्ण: मुक्तिबोध की काव्य-दृष्टि; 48.
5. मुक्तिबोध: एक साहित्यिक डायरी; 49.
6. सुरेश ऋतुपर्ण: मुक्तिबोध की काव्य-दृष्टि; 65.
7. वही; 65.
Received on 25.08.2011
Accepted on 15.09.2011
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Research J. Humanities and Social Sciences. 2(3): July-Sept., 2011, 154-157